आग नफरत की

लगा रहे है आग नफरत की
धर्म की मशाल लेकर
मर रहे है मासूम सारे
बेमतलब अपनी जान देकर

कोई था सिख कोई था इसाई
कोई था हिंदू कोई था मुसलमान
बट गए धर्म मे सारे
ना बचा कोई इंसान

धर्म की रक्षा पहले हो
गुंज रहा यही एक नारा
कट रहे है गले तलवारोंसे
मिट गया सब भाईचारा

ये आग किसने लगाई हैं
ये द्वेष कीसने फैलाया
गंदा कर दिया भारत को
सब खून से नहलाया

ये आग हमे मिटानी हैं
बुराई पे जित पानी हैं
ये धरती है बुद्ध महावीर की
अहिंसा उनकी की वाणी है

- विशाल गोविंदा नर्मलवार

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झिंदाबाद!