डर एक सिर्फ एहसास ही है!

डर एक सिर्फ एहसास ही है!



    पत्रकारीच्या  लेखणीतून 
(यश कायरकर)       
मैं बचपन से दो बातें नहीं सिख पाया, एक *'डर'* और दुसरी *'अंधविश्वास'*! वैसे तो दोनों बातें जुड़ी हुई हैं. डर ही अंधविश्वासों को पैदा करता है, और पालता भी हैं.
                   हम हमेशा सुनते हैं..  "डरना जरूरी हैं!", "डरना मना है!", "जो डर गया समझो मर गया!", फिर सुना  "डर के आगे जीत हैं!"  पर क्या यह कितना सच है ? और डर क्या है ? क्या डरना भी जरुरी है ? और कितना जरूरी है ? क्या डर से छुटकारा मिल सकता हैं ? सवाल कई हैं.
                   सबसे पहले डर क्या हैं...  डर एक सिर्फ *'एहसास'*( आभास) भर हैं. एक ऐसा एहसास हैं...जो हमारे पैदा होते ही ऊसे भी हमारे जहन में बोया जाता हैं. फिर ऊसे पाला पोसा जाता हैं, और हमारे कद, हैसियत से भी कहीं गुना ज्यादा वो बढकर हमारे जह़न पर हावी होने लगता हैं. जिसकी सोच जितनी कमजोर उसपर डर उतना अधिक हावी होने लगता हैं. चलने-दौड़ने लगे तो गिरने का डर बताया गया, भुत-प्रेत के नाम पर डराया गया. भगवान के नाम पर भी डरना सिखाया गया. अंधविश्वास ईसी तरह से पैदा किया गया , जब हम तंदुरुस्त, स्वास्थ्य रहे है तो बिमारियों का डर दिखाकर लुटा जाता हैं, बिमार हुए तो मौत का डर, और तो मौत के बाद और रुह भटकने का डर दिखाकर मोक्ष के नाम लुटा जाता हैं. ये अंधविश्वासी 'डर' हमें सिर्फ बर्बाद ही करता है.
                     2006 मे एक फिल्म आयी थी 'डरना जरुरी है' मुझे यह बात मेरे सोच से परे लगी थी, और मैंने गौर से सोचा था. तब समझा, हमें कभी भी बेवजह नहीं डरना चाहिए. पर डर यह उतना ही और ऊसी हालातों में सच है, जो हमारे हैसीयत से परे हैं. 
    उदा. के तौर पर देखा जाये तो, हमें बिलकुल ही तैरना नहीं आता, तो हमें गहरे पानी से डरना जरूरी है वर्ना हम डुबकर मर जायेंगे.यह सही भी हैं. पर, डर कितने पानी से ? घुटनें तक पानी से नहीं. अगर हमेशा पानी से ही डरोंगे तो बरसात में भिगने का खुशनुमा एहसास जिंदगीभर नहीं पा सकेंगे.बेवजह डर अपनी जिंदगी को ही अपाहिज बना देता हैं. जिंदगी मौत से बदतर बन जाती हैं.
                    बचपन से एक फिल्म देखता रहा हूं 'शोले' जिसमें गब्बरसिंह ये कहते रहे... 'जो डर गया समझो मर गया !' और यही वास्तव जिंदगी में लागू होता हैं. जितना ज्यादा डरोंगे उतने असहाय महसूस करते हुए मरोगे.  विपरीत परिस्थितियों में  बिना डरे बुलंद हौसले से डटकर लढोगे तो हर कठिन परिस्थितियों पर काबू पाया जा सकता हैं. किस तर डर हमें लाचार कमजोर बना देता हैं, इसी के बारे मे मैंने ओसो रजनीश कि एक किताब में पढा था. 'अगर हमें जमीन पर रखे लकड़ी के 4 इंच चौडे मजबूत पट्टी पर चलने के लिए कहा जाये तो हम दौड़ भी सकते हैं, पर वही मजबूत पट्टी 5 फुट ऊंचाई पर है तो लडखडाने लगेंगे, और ऊससे भी ज्यादा मजबूत और चौडी 12 इंच की ऊस लकड़ी के बजाय लोहे की भी पट्टी 50 फुट ऊंचाई पर हो तो शायद हम रेंग कर भी पार ना कर सके,और गिरकर मर जाये.' डर ही हमें गिरायेगा. ऐसा ही आपके अनुभव मे भी कभी आया होंगा , जैसे हम रेल्वे पटरियों पर चलते हैं बेझिझक, पर  रेल्वे पुलिया पर पटरियों के बिच मे लगी लोहे की चौडी प्लेट पर भी हिचकते हैं. वजह एक ही 'डर', ये डर ही हमारा हौसला पस्त कर देता है.
                   मैंने *'डर'* को 30 साल पहले बचपन में भुला दिया. जब नवभारत हिन्दी दैनिक मे एक बात पढी और *'डर'* नाम के *'एहसास'* से छुटकारा मिल गया. लिखा था.. "कोई भी डर मौत से बडा नहीं हो सकता, और मौत  जिंदगी का एक अंतिम सत्य है!".
    ✍🏽 यश कायरकर,सावरगांव
                ( 9881823083.)

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